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Showing posts from April, 2017

संध्या

अंबर पथ से उतर रही अलसाती सी , मदमाती सी सौंदर्य गर्विता नारी है वो ज्यों नदी कोई बल खाती सी कवि गण की प्रेयसी है वो कर देती उन्हें अनुरागी कोमल कमनीय कंठ गूँज उठते कईं राग , वि...

आशा

.राह है दूभर विकल है तन , मन पुलकित नहीं है वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है किंतु , परंतु , आशा , निराशा सब हैं मन में आते पर भवितव्यता के बस में हम सब जीते जाते तिमिरावृत...

दो अजनबी

बार में घुसते ही उस गौरांग सुदर्शन युवक ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो सारी मेजें भरी हुई थीं । मन में आया इस छोटे से शहर में इतने पीने वालें कहाँ से जुट गए तभी काँच की खिड़की क...

ऋतु वर्णन

ग्रीष्म ऋतु सूर्य भीषण ताप है देता शशि शीतल सुंदर शुष्क तालु मृग भटकते देख मरीचिका क्षण भर पावस ऋतु चातकों की तृषा कुल याचना स्वीकार शीघ्र करते हैं जलद श्यामल वर्षा कर प्...