आदित्य अवसान हुआ नभ में मैं पुलक , रोमांचित हुई हिय में अति उत्सुक शशि स्वागत के लिए संध्या मादक हुई अपरिमेय तिमिर आच्छादित प्रांगण में पिय की छवि है कंगन में दीप प्रज्जवलित शोभायमान मिलन बेला निकट जान #दुआ
कौन कहता है चेहरे से इश्क होता है हमने ऐ बेखबर साये से मोहब्बत की है विदा देते हैं भीगी नज़रों के कंवल याद की झील में उगती है हर इक शाम गुज़रे पल छिन की यादों के उजाले छलके कौन देता है ज़हन में दस्तक हल्के -हल्के खामोशी जो बोलती है कहने दो रूह से टपके कतरा - शबनम बहने दो तसव्वुर में हँसता है अक्स सनम का नूर की बूँद को मुकम्मल होने दो #दुआ
घाव अच्छे हैं अब लगते, दर्द होता है थोड़ा सा ये दुआएँ तुम्हारी हैं , मुझे पहले पता ना था तुम दिल के पास हो इतने ,धड़कते हो सीने में मैं ख़ुद को भूल जाती हूँ , मुझे पहले पता ना था ज़िस्म की बंदिशें भूली , भटकती हूँ रूह बनकर ये अहसास की खुशबू , मुझे पहले पता ना था चाँद नमकीन होता है , चखा था कल रात मैंने ज़बाँ का ये ज़ायका , मुझे पहले पता ना था आँखों - आँखों में कह देते हो हज़ारों बातें गुफ़्तगू का ये सिलसिला , मुझे पहले पता ना था #अर्चना अग्रवाल
जी तो रहे तुम बिन तुम साथ होते तो क्या होता गुलमोहर दहकता और तरह आँख में पानी ना होता धानी चुनर उड़कर लिपट जाती तुमसे बारिश में मेरा मन प्यासा ना होता किताबों के सफ़े फड़फड़ा कर रह जाते हैं किस्सों में भरा गम ना होता तुम साथ होते तो क्या होता गुलमोहर दहकता और तरह आँख में पानी ना होता
काँच सा कच्चा मन हरा हो गया फागुनी फिर सफर हो गया ढोलकें , शंख , होरी , ऋचाएँ मन गीतों का घर हो गया हृदय स्पंदित , अप्रतिम प्रेम कल्पना में मिलन हो गया पूज्य हो तुम ,आराध्य हो तुम 'अर्चना ' हर प्रहर हो गया .. #दुआ