कुछ कविताएँ


 शांत स्पंदन जल लहरी
मैं आ बैठी सागर- तीरे 
नियति शासन से विवश
संध्या अवतरित हुई धीरे-धीरे
अश्रु संग तम घोल लिखती 
पिय वियोग का वह इतिहास
कहीं दूर एक नन्ही पाखी
सहसा कर बैठी मृदु हास 
क्यूँ तू इतनी है खिलखिलाती
किसे है स्मृति पथ में लाती ?


अरी पगली , सुन हो गंभीर
पिय बिदेस हृदय विकल अधीर
श्रृंगार , हार छूटा है समस्त 
अस्थिर चित्त ,सुमिरन में व्यस्त 
अलकें उलझीं , दुर्भर पीड़ा 
वो मोहिनी छवि केलि- क्रीड़ा 
नहीं अपराध मेरा है जग - माया
यत्र-सर्वत्र तम की छाया 
क्रूर भाग्य की ये निर्ममता
हिय क्रंदित विष विषमता

#अर्चना अग्रवाल 
                          2

कैसे लिखूँ उन बातों को
जो कह दी थीं बस इक क्षण में 
जब थम गई थी पृथ्वी
रूक गया था सब कुछ 
बस इक उस क्षण में 
मैंने जी लिए थे असंख्य जन्म
भोला पाखी सा मन
चाँद को मुठ्ठी में भर लेना चाहता था 
तब मैंने स्वयं को उगते देखा था
तुम्हारी बाँहों में 

#अर्चना अग्रवाल 
   
                        3
कुछ लम्हे गिरे थे
सहेज लिया नज़ाकत से उन्हें
एक रेशमी कढ़ाई के रूमाल में
बाद मुद्दत के देखा उन्हें
मोगरे के फूल थे महकते हुए
#अर्चना अग्रवाल 

                4
इस शहर से मन भर गया यारों
चलो शहर कोई दूसरा बसाया जाए

बिना मतलब के भी बात कर लो
क्या ज़रूरत है मतलब पे याद आया जाए

उगते सूरज को सब सलाम करते हैं
कभी अँधेरो से दिल लगाया जाए

हो ही जाती है सबसे गलती कभी ना कभी
क्या ज़रूरी है फ़ासला बढ़ाया जाए

दिल में छुपी रहती हैं मासूम ख्वाहिशें कितनी
क्यों न आज चाँद को बताया जाए

#अर्चना अग्रवाल 

               5

हाँ मुझे चलना होगा 

हाँ मुझे चलना होगा
सांझ की देहरी का
दिया बन जलना होगा
हाँ मुझे चलना होगा

आग और पानी का खेल चले 
ज़द्दोज़हद की लड़ाई चले
लक्ष्य तक पहुँचना होगा
हाँ मुझे चलना होगा

शब्दों के दावानल घेरे 
ज़िंदा रहने की तड़प पले 
मृत्यु भी शिकंजा कसे 
किसी अणु में पलना होगा
हाँ मुझे चलना होगा

भीतर मेरे है कोई जाग रहा
जो नित्य नव समर लड़ा 
पुनः विश्वास् ढूँढना होगा
हाँ मुझे चलना होगा

मार्ग में कंटक मिले
पाँव में छाले पड़े 
घाव को भूलना होगा 
हाँ मुझे चलना होगा

#अर्चना अग्रवाल 

             6

कुछ घड़ी होती उर्वर
नमी पा अश्रु जल की
प्रस्फुटित कर देतीं 
कोंपले काव्य की
कुछ पल होते बंजर सदृश
भावों , अनुभावों से इतर
संवेदनाओं से शून्य
रिक्तता से आवृत्त
बस , इन दोनों के मध्य ही कहीं
तुम्हें गढ़ना है .....
#अर्चना अग्रवाल
   
                         7
स्मृतियाँ 

विगत को निहारती हूँ 
कुछ मादक स्मृतियाँ पाती हूँ 
कुछ मधुरा हैं , कुछ त्वरा हैं 
कुछ पुलक भरी कुछ अतिरंजित

कभी राग-विराग , कभी संकुचन 
कभी निराशा कभी जीवन धन 
कभी व्याकुलता कभी आकुलता 
कभी भ्रांत हुई कभी शांत रही

था समर्पण कहीं ,आकर्षण कहीं 
नितांत अपरिचित थी नियति 
सतत प्रेरणा थी संग - संग 
देखे मैंने कुछ नव्य रंग

कहीं प्रस्तर मिले मार्ग में
थीं कहीं गुह्य कंदराएँ 
कहीं गुलमोहर थे खिले हुए
कहीं सूखे पत्ते गिरे हुए

#अर्चना अग्रवाल 


        8
असंभव नहीं
देह में होकर
देह से भिन्न सोचना
कठिन है असंभव नहीं 
बात करना बहती नदी से ,वृक्ष से
सुखद है असंभव नहीं 
स्वयं में रहकर तुम्हें पा लेना
प्रेम है वासना नहीं 
दहकते पलाश पर कविता लिखना
भाव है , उन्मुक्तता नहीं

सुर साधना 
नाभि तक उठना अनहद नाद
कठिन है असंभव नहीं 
फूस की झोंपड़ी में खिलखिलाहट 
सुखद है असंभव नहीं 
हल्की वर्षा से मदिर गंध 
नशा है व्यसन नहीं 
जीने के लिए कविता लिखना
खूबसूरत है विवशता नहीं

#अर्चना अग्रवाल







Comments

Popular posts from this blog

सृष्टि रहस्य

लम्हे

भीतर के घाव