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Showing posts from September, 2017

कुछ दिल से

एक बार फिर से ख्वाहिश हुई है जीने की , वज़ह भी पता नहीं , पर तलब सी लगी है जीने की । कुछ है जो रह-रह के घुमड़ता है दिल में ,आकार नहीं दे पाती , लिख नहीं पाती पर कुछ तो है जो धुंध की तरह सी...