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Showing posts from August, 2018

चाय के दो कप

मैं नीर भरी दुख की बदली! स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रंदन में आहत विश्व हँसा, नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झणी मचली! कवयित्री महादेवी वर्मा की कविता पढ़ते-पढ़ते स...

स्मृतियाँ

विगत को निहारती हूँ कुछ मादक स्मृतियाँ पाती हूँ कुछ मधुरा हैं , कुछ त्वरा हैं कुछ पुलक भरी कुछ अतिरंजित कभी राग-विराग , कभी संकुचन कभी निराशा कभी जीवन धन कभी व्याकुलता कभी आ...