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Showing posts from December, 2018

खामोशी में लफ़्ज़ बोलते हैं

खामोशी में लफ़्ज़ बोलते हैं ज़ुबाँ न सही अक्स बोलते हैं जीने की जुम्बिश  ज़रूरी है मगर कभी-कभी वीराने के सफ़र बोलते हैं खामोशी में लफ़्ज़ बोलते हैं जब ज़ज्बात भर जाए दर्द ...

तुम रहने दो

तुम रहने दो ..... तुमसे मोहब्बत  हो नहीं पाएगी मेरी भावनाएं , मेरी संवेदनाएँ , मेरी चुप्पी जो अनकहा था है और शायद रहेगा भी नारी मन को भला कौन पढ़ पाया है ? कौन समझ पाया है , कौन गुन पाया है ? तो तुम भी कैसे समझ पाओगे ? पुरुष जो ठहरे जानते नहीं हो शायद नारी का प्यार मन से शुरू होता है और तुम्हारा अनुराग तन से बस ... तुम रहने दो ... तुमसे मोहब्बत हो नहीं पाएगी #दुआ

जीत लेती हूँ

थोड़ा जीत लेती हूँ थोड़ा हार जाती हूँ साँसों की लय में हरदम वही संगीत पाती हूँ कभी अँधेरा है घना कभी उजास दिखती है इस धूप छौंही खेल में खुद को फिर भी ढूँढ लेती हूँ ऑखें बंद कर ...

तुम ही

तुम्हारा छूना याद दिला देता है देह को , औरत होने को भूल जाती सारे दुख समीप रहती केवल अंतरंगता मादक स्पर्श , गंध तुम्हारी दूर कहीं मुरली की धुन प्रिय कर लगती कानों को तुम तराश...

रात

आगोश में वो आए तो साँसें थम गईं एक चाँद बहक गया एक रात मचल गई #दुआ