Posts

Showing posts from February, 2018

यूँ ही ......

यूँ ही बैठे-बैठे सोचती हूँ मैं क्या वो भी मुझे सोचता होगा जब सुनाई देती होगी मेरी सदा क्या पलट कर देखता होगा जब गिरती होंगी बारिशें क्या मुझे खोजता होगा उतरती होगी जब शाम नश...

जीत कैसी है

हार कैसी है ये जीत कैसी है प्रिय तुमसे ये प्रीत कैसी है रूष्ट होना फिर मिलना प्रणय में ये रीत  कैसी है मिलन में पुनः अवरोध है कैसा स्व को खोने का बोध है कैसा सौंप दिया तुझे जब ...

पी का वियोग

नयनों में डोरे लाल पी का वियोग है भारी जागे गोरी रात भर जीवन संग्राम कटारी चिर वियोग की ज्वाला है दग्ध हो उठा हृदय कठिन है ये साधना बहुत किंतु पावन है प्रणय केश हैं  रूखे , हो...

मेरा नाम , तुम्हारा नाम

उड़ चलो मेरे साथ दर्द को अंगीकार कर नीले आकाश से ऊपर अनंत क्षितिज की ओर एक मधुर तान कहीं दूर से आ रही है तुम मेरी रात्रि के चाँद हो ताकि मैं देख सकूँ खूबसूरत सितारे मदमाता इत...

चाँद को बताया जाए

इस शहर से मन भर गया यारों चलो शहर कोई दूसरा बसाया जाए बिना मतलब के भी बात कर लो क्या ज़रूरत है मतलब पे याद आया जाए उगते सूरज को सब सलाम करते हैं कभी अँधेरो से दिल लगाया जाए हो ही ...

हाँ मुझे चलना होगा

हाँ मुझे चलना होगा सांझ की देहरी का दिया बन जलना होगा हाँ मुझे चलना होगा आग और पानी का खेल चले ज़द्दोज़हद की लड़ाई चले लक्ष्य तक पहुँचना होगा हाँ मुझे चलना होगा शब्दों के द...

कुछ शेष रह जाता है

हृदय के सादे कागज़ पर कोलाहल रचने लगती हूँ कलम जब चलती है निरंतर आग से गुज़रने लगती हूँ विडम्बना ये है फिर भी कुछ शेष रह जाता है कहती हूँ हर बार बहुत कुछ एक कोना अछूता रह जाता ...

फिर आऊँगी

आज फिर तेरे शहर में घूमने गई कुछ यादें मिलीं सीली - सीली कुछ तहखाने देखे घुप्प अँधेरे जहाँ दफन थीं तेरी मेरी बातें हो सके तो बारिश की चंद बूँदे संजो लेना मैं आऊँगी लेने यदि ज...

सिसकियों की मर्म व्यथा

लिख दी सिसकियों ने मर्म व्यथा कुछ आधी - अधूरी रही कथा संध्या धूमिल थी , दीप प्रज्जवलित रुकी वायु , जीवन प्रतीक्षित मन था भयमय , मौन सतत प्रहरी बस मैं ही मैं , और कोई नहीं खिन्नता ,...