कुछ शेष रह जाता है

हृदय के सादे कागज़ पर
कोलाहल रचने लगती हूँ
कलम जब चलती है निरंतर
आग से गुज़रने लगती हूँ

विडम्बना ये है फिर भी
कुछ शेष रह जाता है
कहती हूँ हर बार बहुत कुछ
एक कोना अछूता रह जाता है
#दुआ

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