तुम्हारा नेह .. रेशम के कीड़ों सा अर्जुन के वृक्ष पर पले , बढ़े तब तक रेशम की गुठली ना निकाली जाए जब तक मेरा प्रेम .. सुर साधक के विकल कंठ सा आत्मा के आर्तनाद की तरह अविरल रक्त प्र...
चाँद की ज़मीं पर खेती करनी है बोने हैं कुछ सपने , कुछ भाव सलोने अश्रु जल से सिंचाई कर रोज़ निगहबानी करनी है चाँद की ज़मीं पर खेती करनी है ... जो मिल ना सका इस धरती पर उसकी फसल उगान...
ज़िंदगी क्या है ? दवा , दुआ , सफर या एक अनजाना सा रास्ता ये तो पता नहीं पर इतना जानती हूँ कि इस रास्ते के अंतिम छोर पर एक उजली रोशनी है लोग उसे मौत कहते हैं , काली छाया कहते हैं लेकि...
देह में होकर देह से भिन्न सोचना कठिन है असंभव नहीं बात करना बहती नदी से ,वृक्ष से सुखद है असंभव नहीं स्वयं में रहकर तुम्हें पा लेना प्रेम है वासना नहीं दहकते पलाश पर कविता ...
मेरी धूप जब तक चाँदनी ना बन जाए तुम्हारी बाट जोहती है आँगन की ड्योढ़ी का दिया जलकर तुम्हें ढूँढता है खेत की मेड़ का पानी रिसकर तुम्हारी राह धोता है और मेरा मन ... वो बस खोया रहत...
बस चुपचाप बैठो मेरे पास सुनो मेरी खामोशी महसूस करो वो अनकहा जो उमड़ घुमड़ रहा अन्तस में युग-युगांतर से पिछले कई जन्मों से इस जन्म तक अब तो सुन लो ........ जब भ्रमण करेंगी हमारी आत्...