कहाँ ?

मेरी धूप जब तक चाँदनी ना बन जाए
तुम्हारी बाट जोहती है
आँगन की ड्योढ़ी का दिया
जलकर तुम्हें ढूँढता है
खेत की मेड़ का पानी रिसकर
तुम्हारी राह धोता है
और मेरा मन ...
वो बस खोया रहता है

तुम्हें पाने में ख़ुद को खो बैठी
सौदा घाटे का कर बैठी
जीवन तुम बिन ऐसे जिया
जैसे कोई समाधि का दिया
समर्पण कर मैं हार गई
सर्वस्व तुम पर वार गई
जब ना रहूँगी यहाँ
ढूंढोगे मुझको कहाँ - कहाँ  ?

#दुआ

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