जब भी देखूँ तेरा चेहरा नज़र आए
किताब खुले तो सफ़ा कहाँ नज़र आए
तेरी बातें , तेरी यादें और आँखें तेरी
अल्फ़ाज़ में तेरी हँसी नज़र आए
दिल लगा के मेरा हाल बुरा हो गया
अब आईने में तेरी सूरत नज़र आए
देह में होकर देह से भिन्न सोचना कठिन है असंभव नहीं बात करना बहती नदी से ,वृक्ष से सुखद है असंभव नहीं स्वयं में रहकर तुम्हें पा लेना प्रेम है वासना नहीं दहकते पलाश पर कविता ...
चेहरों पर चेहरे सजाए हुए हैं सब ही मुखौटे लगाए हुए हैं होठों पे बैठे खामोशी के पहरे दिल में दर्द के सागर गहरे कर जाती त्रुटि मैं पढ़ने में उनको हो जाती कुंठित मेरी चेतना समय...
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