मैं नीर भरी दुख की बदली! स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रंदन में आहत विश्व हँसा, नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झणी मचली! कवयित्री महादेवी वर्मा की कविता पढ़ते-पढ़ते स...
विगत को निहारती हूँ कुछ मादक स्मृतियाँ पाती हूँ कुछ मधुरा हैं , कुछ त्वरा हैं कुछ पुलक भरी कुछ अतिरंजित कभी राग-विराग , कभी संकुचन कभी निराशा कभी जीवन धन कभी व्याकुलता कभी आ...
तुम्हारी याद अब भी है सिगरेट के अधबुझे टुकड़ों में बादलों के आगोश में छुपे धूमिल से चाँद में घर के पास खड़े पेड़ में छुपी कोयल की कूक में और सच बताऊँ तुम्हारी उतारी कमीज़ म...
तुम्हारा नेह .. रेशम के कीड़ों सा अर्जुन के वृक्ष पर पले , बढ़े तब तक रेशम की गुठली ना निकाली जाए जब तक मेरा प्रेम .. सुर साधक के विकल कंठ सा आत्मा के आर्तनाद की तरह अविरल रक्त प्रवाह समान कुछ समझे ? #दुआ
चाँद की ज़मीं पर खेती करनी है बोने हैं कुछ सपने , कुछ भाव सलोने अश्रु जल से सिंचाई कर रोज़ निगहबानी करनी है चाँद की ज़मीं पर खेती करनी है ... जो मिल ना सका इस धरती पर उसकी फसल उगान...
ज़िंदगी क्या है ? दवा , दुआ , सफर या एक अनजाना सा रास्ता ये तो पता नहीं पर इतना जानती हूँ कि इस रास्ते के अंतिम छोर पर एक उजली रोशनी है लोग उसे मौत कहते हैं , काली छाया कहते हैं लेकि...