कुछ घड़ी होती उर्वर नमी पा अश्रु जल की प्रस्फुटित कर देतीं कोंपले काव्य की कुछ पल होते बंजर सदृश भावों , अनुभावों से इतर संवेदनाओं से शून्य रिक्तता से आवृत्त बस , इन दोनों क...
प्रेम के ज्यामितीय आकारों में मुझे वृत्त पसंद था क्योंकि वो केवल तुम्हारे चहुँओर था और तुम्हें त्रिकोण चूंकि वो किसी तीसरे के साथ था मैं वृत्त में तुम्हारे इर्दगिर्द घू...
रुधिर पूर्त नसें भयंकर ज्वाला शमन उपचार प्रिय ने निकाला बाधा , विलंब ना माने मन क्षण भर सुख शीतल तन आहत मान हुआ पराभूत स्मृति बनी शांति दूत जीवन जागरण , सुषुप्ति मरण माँस मज्जा का ये आवरण कुछ प्रकाश धूमिल सा दीख रहा मौन खिन्न , अवसाद भरा दूरागत ध्वनि सुनती यहाँ ऐसी निस्तब्धता और कहाँ #दुआ
आदित्य अवसान हुआ नभ में मैं पुलक , रोमांचित हुई हिय में अति उत्सुक शशि स्वागत के लिए संध्या मादक हुई अपरिमेय तिमिर आच्छादित प्रांगण में पिय की छवि है कंगन में दीप प्...
हृदय में जागी नव अभिलाषा कुछ अतिरंजित कुछ उत्प्रेरक सी विचारों की यह नव तरिणी होती अग्रसर नवयौवना सी मैं तटस्थ बैठी ध्यानमग्न देख रही ये नव विचलन जीवन का नूतन मार्ग यह अ...
रोज़ देखती हूँ एक सपना रोज़ तोड़ देती हूँ पसीने से सीज़ी हथेली पर कितने रंग संजोती हूँ आकाश पर उड़ती चील कलम मेरी छीन लेती है अधूरी कुछ कहानियाँ , कुछ कविताएँ इर्द-गिर्द मं...
मधुमय बसंत तुम जीवन धन तुम अलसाई अलकों में राग चंद्र तुम कुंतल जाल पाश में मेरे हृदय को करती कैद तुम पुलकित , उन्नत सर्वांग मेरा मधुकरी का संचित धन तुम
आज भी याद आती है वो कलम से लिखी चिठ्ठी जिस पर मिलती थीं अपनों की खबरें वो दुख की तस्वीरें वो सुख की तहरीरें पेड़ों पर लगे आम खेतों में लहलहाता धान सब दिखता था उसमें अम्मा की द...
हे कुर्सी माता कैसे करूँ मैं तेरी श्लाघा तुम ही जग को नचाती हो स्वप्न में नित भरमाती हो छ्ल, प्रपंच सब तुम्हरे कारण दूध मलाई दे जाती हो ठाठ - बाठ सब नौकर-चाकर संग अपने लाती हो न...