मधुमय बसंत तुम
जीवन धन तुम
अलसाई अलकों में
राग चंद्र तुम
कुंतल जाल पाश में
मेरे हृदय को
करती कैद तुम
पुलकित , उन्नत सर्वांग मेरा
मधुकरी का संचित धन तुम
सागर सम इस सृष्टि में होता लहरों का नर्त्तन हैं मदिर , अत्यंत सुरभिमय ह्वदयंगम भाव आवर्त्तन मुखरित हैं गीत संगीत यहाँ ,नुपूर कंकण बज रहे प्रखर पावस में अगणित ज्योर्तिकण च...
चेहरों पर चेहरे सजाए हुए हैं सब ही मुखौटे लगाए हुए हैं होठों पे बैठे खामोशी के पहरे दिल में दर्द के सागर गहरे कर जाती त्रुटि मैं पढ़ने में उनको हो जाती कुंठित मेरी चेतना समय...
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