सपना

रोज़ देखती हूँ एक सपना
रोज़ तोड़ देती हूँ
पसीने से सीज़ी हथेली पर
कितने रंग संजोती हूँ
आकाश पर उड़ती चील
कलम मेरी छीन लेती है
अधूरी कुछ कहानियाँ , कुछ कविताएँ
इर्द-गिर्द मंडराती हैं
गीली भावनाएँ , प्यासी आँखें
फिर दिखाती हैं नया सपना
#दुआ

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