पीर बढ़ रही है चलो मुस्कुराते हैं आँख भरने लगी है चलो गाते हैं प्राण हैं विकलित कुछ लिखते हैं भीतर के घाव बाहर कहाँ दिखते हैं ? तुम कहो शहर हम जंगल कहते हैं गुलमोहर के फूल जह...
सागर सम इस सृष्टि में होता लहरों का नर्त्तन हैं मदिर , अत्यंत सुरभिमय ह्वदयंगम भाव आवर्त्तन मुखरित हैं गीत संगीत यहाँ ,नुपूर कंकण बज रहे प्रखर पावस में अगणित ज्योर्तिकण च...
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