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Showing posts from September, 2019

चाँद देखना

तुम अपने शहर में चाँद देखना मैं अपने शहर में मैं उसमें खारे पानी का दरिया देखूँगी तुम भावनाओं के ज्वार देखना वहाँ हमारा छोटा सा घर भी है जिसके दरवाज़े नीलम से बने हैं और रसो...

मेरे सिरहाने

मेरे सिरहाने तेरी यादों के साये हैं आज फ़िर तेरी रहगुज़र में आए हैं वो दूर सुनहरी ख्वाबों की बस्ती है अकीदत से हम उसे बसा आए हैं दिल की दुनिया है बड़ी संगीन सी बस तज़ल्ली हिज...

आज दिल

आज दिल कुछ उदास सा है ज़ख्म भी कुछ खास सा है शिद्दत से निभ जाती थी वो रस्म हाल उसका बदहवास सा है शाम से ही धुंधली यादों का हुजूम मेरे तन्हा दिल के आस-पास सा है मैं चाहती थी वो भी ...

जीना चाहती हूँ

कुछ पन्ने फ़िर लिखना चाहती हूँ मैं ज़िंदगी दोबारा जीना चाहती हूँ मिटा दूँ कालखंड से चॉक के निशाँ डस्टर से अतीत पोंछना चाहती हूँ बनूँ फ़िर अपनी मर्जी की मालिक तकदीर फिर लि...

सच कहो

सच कहो अब भी तुम्हारे ज़हन में आती हूँ क्या ? यूँ चौखट पर खड़े तुम्हारा इंतज़ार करती पाते हो क्या ? वो तुम्हें ढूँढती निगाहें वो बेकली मुझमें पाते हो क्या कुछ कहने को हिलते पर ...

प्रेम गीत

कसमसाती देह पर अंकन छोड़ दो कान में गुनगुना कर मकरंद घोल दो हम आप घुल जाएँ यूँ इत्र की तरह यौवन का लरजता तटबंध तोड़ दो मन से मन , तन से तन कुछ मिले इस तरह उफनती नदी का चलन मोड़ दो ...

खलिश

कुछ एहसास भीगे - भीगे से हैं कुछ कागज़ पर नमी आई तो है तेरे दिल में कुछ खलिश सी है वो बात ज़ुबाँ पर आई तो है #दुआ

अभी ठीक से

अभी ठीक से कहाँ  देख पाई तुम्हें अभी ठीक से कहां चीन्ह पाई तुम्हे                         तुम जो परत दर परत खुलते रहे अभी ठीक से कहां समझ पाई तुम्हें अंतर्मन की गुफा अंधेरी ...

तलबगार ना थे

उनसे ना मिले थे तो तलबगार ना थे और कुछ भी थे मगर बेज़ार ना थे वो जो कसक सी लगे है दिल में हालात अपने आज़ार ना थे ये तीरगी है मेरे मुकद्दर की मेरे हिस्से में ख़ार - ज़ार ना थे सब्र ...

अहसास की खुशबू

घाव अच्छे हैं अब लगते, दर्द होता है थोड़ा सा ये दुआएँ तुम्हारी हैं , मुझे पहले पता ना था तुम दिल के पास हो इतने ,धड़कते हो सीने में मैं ख़ुद को भूल जाती हूँ , मुझे पहले पता ना था ज़...

संध्या

शांत स्पंदन जल लहरी मैं आ बैठी सागर- तीरे नियति शासन से विवश संध्या अवतरित हुई धीरे-धीरे अश्रु संग तम घोल लिखती पिय वियोग का वह इतिहास कहीं दूर एक नन्ही पाखी सहसा कर बैठी मृ...

भीतर के घाव

पीर बढ़ रही है चलो मुस्कुराते हैं आँख भरने लगी है चलो गाते हैं प्राण हैं विकलित कुछ लिखते हैं भीतर के घाव बाहर कहाँ दिखते हैं  ? तुम कहो शहर हम जंगल कहते हैं गुलमोहर के फूल जह...

मन का सावन

रोज़ सवेरे जो खोल लेते हो गेसू अब शाम देखूँ कि सवेरा देखूँ चाँद बेपरदा रहे तुम परदे में उसके जमाल को देखूँ कि तुमसे बात करुँ इश्क की बारिश में हम भीगते रहे तेरा इन्कार देखूँ ...

पीर बढ़ रही है

पीर बढ़ रही है चलो मुस्कुराते हैं आँख भरने लगी है चलो गाते हैं प्राण हैं विकलित कुछ लिखते हैं भीतर के घाव बाहर कहाँ दिखते हैं तुम कहो शहर हम जंगल कहते हैं गुलमोहर के फूल जहाँ दहकते हैं अपवाद ही अपवाद नियम कहाँ ठहरते हैं जिजीविषा है पर शमशान में रहते हैं इंसानों के वेश में भेड़िए रहते हैं बच्ची भी सुरक्षित नहीं , हम कहते हैं कपड़ों ,घूमने को बनाते हैं ढाल प्रशासन की चुप्पी हम सहते हैं #दुआ

ज़िंदगी

कतरा - कतरा ढूँढता रहा ज़िंदगी एक लिबास की तरह पहनी ज़िंदगी कभी बेहिसाब जी थी ज़िंदगी कभी दर्द के साये में थी ज़िंदगी रूठी थी हम मनाते रहे ज़िंदगी दरवेशों सी भटकती रही ज़िंदगी रिश्तों के मकड़जाल में उलझी ज़िंदगी आँख गीली और रूह प्यासी ज़िंदगी दोज़ख भी और जन्नत भी है ज़िंदगी निगाहे - शौक की तलबगार है ज़िंदगी उम्मीदो- बीम है बड़ी ज़िंदगी फ़ज़ाए - दो-आलम से लिपटी ज़िंदगी शबनम की दो बूँदों में सिमटी ज़िंदगी कभी उफ़ तो कभी हाय है ज़िंदगी #दुआ

तारे पर नाम

चुप रहें अधर संवाद पूरा हो जाए बनूँ ना याचक , याचना स्वीकार हो जाए श्रेय ना मिले तो कोई बात नहीं किसी तारे पर मेरा नाम हो जाए कोई तो याद करे मुझे मरने के बाद किसी का एक क्षण मेरे ...

नन्ही बदली

वो जो नन्ही सी इक बदली है छुप-छुप कर इशारे करती हैं भिगोकर मेरा तन-मन यूँ मुझे बावरा करती है कभी चाँद की ओट से लुकाछिपी के खेल में वो सरपट दौड़ लगाती है मैं पीछे रह जाऊँ तो मुझे...

कैसे लिखूँ

कैसे लिखूँ उन बातों को जो कह दी थीं तुमने इक क्षण में जब थम गई थी पृथ्वी रूक गया था सब कुछ बस इक उस क्षण में मैंने जी लिए थे असंख्य जन्म भोला पाखी सा मन चाँद को मुठ्ठी में भर लेन...

कांधे का तिल

तेरा कांधे का तिल हमें सोने नहीं देता सोने नहीं देता हमें रोने नहीं देता जब भी याद आ जाए उसकी दुनिया में दिल लगने नहीं देता #दुआ

लम्हे

कुछ लम्हे गिरे थे सहेज लिया नज़ाकत से उन्हें एक रेशमी कढ़ाई के रूमाल में बाद मुद्दत के देखा उन्हें मोगरे के फूल थे महकते हुए #दुआ