वो रात दो बजे की चाय

याद है तुम्हें ? अक्सर रात को दो बजे तुम्हारी चाय की तलब । किटकिटाती सर्दी

हो या पसीने से भरी गर्मी , तुम्हें चाहिए कड़क ब्राऊन चाय । सच बड़ी कोफ़्त

होती थी कभी-कभी । पर कभी-कभी अच्छा भी लगता था कि कोई है जिसे मेरी

ज़रूरत है । ज़िंदगी सीली यादों के सहारे छीज़ती जाती है और दिल का मकान

तरसता है एक अदद आहट के लिए । कोई मन की खिड़की का कांच ही

चकनाचूर कर दे कुछ तो हो आहट , आवाज़ । कुछ पाने के लिए बहुत कुछ

पीछे छूटता जाता है जो हम देखकर भी अनदेखा कर जाते हैं या यूँ कहिए कि

देखना नहीं चाहते पर वो होता तो है अकाट्य सत्य जिसे समय के थपेड़े भी कई

बार मिटा नहीं पाते । बड़ी अज़ीब सी होती है ये दिल की दुनिया , कभी इतनी

विशाल कि अपरिचित को भी अपना बना ले तो कभी इतनी तंग कि अपने भी

साथ हों तो घुटन सी होती है , जी घबराता है , है ना ! कईं बार हम वो याद करते

हैं जो नहीं करना चाहिए और उसे भूल जाते हैं जो हमेशा अंकित रहता है दिल के

किसी कोने में I इस रात की चाय में जाने कितनी अशेष स्मृतियाँ जुड़ी हैं जो इसे

विशिष्ट बनाती हैं । ये मेरे जीवन के बहुमूल्य क्षण हैं जो अपने दामन में मोतियों

की तरह संजो रखे हैं मैने । शायद अंतिम क्षणों में ये सुनहरी पताकाओं की तरह

फहराएँगें उस वक्त कह उठूँगी मैं उफ़्फ़ , वो रात के दो बजे की चाय !

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