कुछ मन की
लेखन वास्तव में दुरूह कार्य है , जब किसी पात्र की हत्या करनी होती है ना तो
कैसा - कैसा उमड़ता घुमड़ता मन में कि क्या बताएँ बस । कई बार रोई हूँ मैं
किसी को मारकर अपनी कहानी में Iएक अज़ीब सा घेरा बन जाता है चारों तरफ
जो ना सोने देता है ना जागने एक बैचैनी सी छाई रहती है दिल और दिमाग में ,
सच्ची |
ये जो चाँद है ना शुरू से मुझे Facinate करता है , बस इसको देख लूँ तो
कुछ सुरूर जा छा जाता है । बहुत बातें करती हूँ इससे , सारी लिख दूँ तो दुनिया
भर का कागज़ चाहिए और सदियाँ भी । कौन कितनी सुन पाएगा मेरी दीवानगी
मेरे सिवा ? कोई नहीं । शायद समझ भी ना पाए मेरी बातें I
अंदर मन की गुफा के किसी भीतरी हिस्से में जाने क्या-क्या छुपा , दबा रहता है
जो बाहर आने के लिए कुलबुलाता रहता है , कभी शब्द नहीं मिल पाते तो कभी
भाव अधूरे से रह जाते हैं । ये जो पागल मन है न हमारा , कितना कुछ सहेजे
रहता है , स्मृतियाँ कुछ खट्टी कुछ मीठी जो कभी भी घेर लेती हैं हमें आकाश में
छाए बदरा की तरह , फिर तो वो फुहार बरसती है कि कभी मन भीगता है कभी
तन । कभी भीड़ में अकेले हो जाते हैं तो कभी अकेले में भीड़ महसूस होती है
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