दोपहर

गर्मी की दोपहर है सूनी सी , अलसायी सी 
दिवस काल में छोटे से टुकड़े  की भाँति समायी सी
निस्तब्ध खड़ी मैं इस मोड़ पर किंचित सकुचायी सी
आँख नींद से मुंदी जाती , बीच-बीच में जग जाती
शैशव - स्मृतियाँ ज्यों प्रभातकाल की संग है मेरे थाती सी
प्रश्नय देती इस तीव्रता में , घात-प्रतिघात से बचा जाती
विश्व लिपिक की लेखनी लिखती , मैं केवल पात्र निभाती जाती
अर्ध निमीलित नैनों की पलकों पर सपना खेला है
समय के पन्ने पर फीकी स्याही सी दोपहर की बेला है 

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