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propose day

लफ़्ज़ो की ज़रूरत ही नहीं है  तुम मुस्कुरा देना मैं पलकें झुका लूँगी 😊 #दुआ  #ProposeDay

अर्चना

काँच सा कच्चा मन हरा हो गया  फागुनी फिर सफर हो गया  ढोलकें , शंख , होरी , ऋचाएँ  मन गीतों का घर हो गया  हृदय स्पंदित , अप्रतिम प्रेम कल्पना में मिलन हो गया  पूज्य हो तुम ,आराध्य हो तुम 'अर्चना ' हर प्रहर हो गया ..  #दुआ

कुछ अनकही

कुछ कहना है जो शायद आज तक नहीं कहा या कहने की हिम्मत नहीं कर पाई। एक उम्र बीत जाती है मन की बात कह पाने में , कभी दुनिया का डर , कभी अपने आप से ही डर लगता है । शब्दों को तराशना, अंकित कर देना कभी भी आसान नहीं होता । एक सफर तय करना पड़ता है लंबा , अंधेरा और भयावह । तुम्हें शायद कभी पता नहीं चलेगा कि कितना चाहा तुम्हें , कितना पूजा तुम्हें और कितना याद किया तुम्हें ... काश... तुम समझ पाते । अगर मेरे दिल की कॉसिमक रेज़ तुम्हें छू पाती तो तुम जान पाते मेरे भावों को , हृदय के निष्पाप प्रेम को जो सिर्फ तुमसे शुरु होकर तुम पर खत्म हुआ । एक बार देखो मुझे , ज़िस्म की आँखों से नहीं , रूह की आँखों से । पढ़ो मुझे सरसरी नज़र से नहीं , दिल की गहराइयों से । छुओ मुझे हाथों से नहीं , भावों के रेशमी स्पर्श से । तो जान पाओगे मुझे , अर्चना को ,असली अर्चना को जिसे तुमने जाना ही नहीं तुम्हारे पास रहकर भी दूर रही और तुम दूर रहकर भी मेरे बहुत करीब रहे , सच कह रही हूँ मैं एकदम सच । काश... काश तुम समझ पाते

ज़िंदगी यूँ तुम्हें जिया जाए

ज़िंदगी काटी नहीं जाती जी जाती है धूप के टुकड़ों में छाँव के कोनों में विस्मृत स्मृतियों में भविष्य की आशा में आगत की आहट में कल्पना की सुगबुगाहट में ज़िंदगी काटी नहीं जी जाती है ज़िंदगी काटी नहीं जाती जी जाती है चाँद के प्यार में चाँदनी के खुमार में सितारों के साथ में प्रिय की आस में एक अबूझ प्यास में  किस्सों में कहानियों में पात्रों के सृजन में कटुता के विसर्जन में ज़िंदगी काटी नहीं जी जाती है ज़िंदगी काटी नहीं जाती जी जाती है किसी के आँसू पीने में कुछ अच्छा करने में निःस्वार्थ भला करने में तपते हृदय को शीतलता देने में कुछ मधुर लिखने में कुछ अच्छा पढ़ने में ज़िंदगी काटी नहीं जी जाती है #दुआ

इकरार

वो जो तुम कहती हो शरमा के नहीं - नहीं  बुद्धू वही तो प्यार का इकरार है कानों पे झूलती लट को घुमा  मुस्कुराती हो वही तो इज़हार है  मैं कत्थई आँखों में झाँकता हूँ जब भी सामने पाता वफ़ा का इसरार है  देखो , मानो या ना मानो पर सच है यह  इस आँख मिचौली पर दिल निसार है 

आज लबों पे फिर से एक कहानी है रूठी थी जो अब तक वो ज़िंदगानी हैबात ज़िस्म की नहीं ये किस्सा रूहानी है खामोशी में रवाँ नगमों की रवानी है

कभी-कभी

कभी-कभी ख़ुद से बातें करने को जी करता है कभी-कभी ख़्वाबों में रहने को जी करता है ज़िंदगी हर लम्हा रंग बदलती है इन रंगों में रंग जाने को जी करता है दूर है मंज़िल , सफ़र भी है मुश्किल पर एक पल में ही पहुँच जाने को जी करता है महफ़िल में फैली हो जब खामोशी हर तरफ फ़िर तन्हाइयों में रहने को जी करता है ख़ुशियों की दुकानों में मिलती हैं नकली ख़ुशियाँ अब तो मुफ़्त के गम ही पाने को जी करता है कभी-कभी ख़ुद से बातें करने को जी करता है #दुआ

चाहती हूँ

चाहती हूँ तुम में छुपे रहना थोड़ा सा एक चाय के कप में रात के चाँद में मंदिर की जोत में कसैले करेले में आईने की बिंदी में गुनगुनी धूप में तुम जब इन्हें देखो , स्पर्श करो मुझे याद करना चाहती हूँ तुम में .... #दुआ

पापा

 थोड़े नारियल से थे पापा बाहर से कठोर अंदर से मलाई थे पापा बचपन में परी मुझे बुलाते थे दाँत मेरे गिन सोलह बताते थे  जब बंगलौर से दिल्ली ना जा पाई थी चिठ्टी लिख डाक से भिजवाते थे अंतिम समय मिल ना पाई तो क्या  बाद मौत के मिलने आए थे पापा 

ज़रूरी तो नहीं

जिसे तुम चाहो वो भी तुम्हें चाहे ज़रूरी तो नहीं  चाँद तुम्हारा ही रहे हमेशा  ज़रूरी तो नहीं  रूह भटके , मुकाम मिल जाए  ज़रूरी तो नहीं  तिश्नगी लब पे हो , दरिया पास हो ज़रूरी तो नहीं  एक उम्मीद है अब भी बुझे से मन में तुम रूबरू आ जाओ  ज़रूरी तो नहीं  #दुआ

दर्द होता है

घाव अच्छे हैं अब लगते, दर्द होता है थोड़ा सा ये दुआएँ तुम्हारी हैं , मुझे पहले पता ना था तुम दिल के पास हो इतने ,धड़कते हो सीने में मैं ख़ुद को भूल जाती हूँ , मुझे पहले पता न था ज़िस्म की बंदिशें भूली , भटकती हूँ रूह बनकर ये अहसास की खुशबू , मुझे पहले पता ना था चाँद नमकीन होता है , चखा था कल रात मैंने ज़बाँ का ये ज़ायका , मुझे पहले पता ना था आँखों - आँखों में कह देते हो हज़ारों बातें गुफ़्तगू का ये सिलसिला , मुझे पहले पता ना था #दुआ 

तुम कहते तो ...

तुम कहते तो  हार जाती ख़ुद को  मगर ज़रूरी यह  तुम कहते तो ... जुबाँ ना सही  आँखों से बयाँ करती मगर ज़रूरी यह  तुम कहते तो ... हाल बेहाल तो तुम्हारा भी है संवार देती सब कुछ मगर ज़रूरी यह तुम कहते तो ... बहक उठते कदम  महक उठता हरसिंगार आँगन में मगर ज़रूरी यह तुम कहते तो ... ताल में , तलैया में  नदी की कलकल धारा में बह जाते संग - संग मगर ज़रूरी यह तुम कहते तो ... मदिर - मदिर नशा  तारी कर देता हमें हर रोज़ मगर ज़रूरी यह  तुम कहते तो ... #दुआ