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उर्मिला

 जनक नंदिनी उर्मिला अब अपनी कथा सुनाती हूँ प्रभा की धारा से कर अभिषेक वीणा वादिनी की कृपा पाती हूँ मैथिली की अनुजा हूँ मैं जनक पिता की लाडली यौवन में उन्माद लिए मंजुल  में खोई सी रस के निर्झर में सिक्त हो मैं आनंद शिखर बढ़ाती हूँ अहा अनुराग समीर पर इठलाती नित कदंब माला बनाती हूँ नयनों के साँचे में नित अजान पिय का रूप गढूँ हाय मैं लज्जावनत होकर अभिलाषा के दुकूल बुनूँ  सुनो सखी ये मधुकर गुंजार हो रहा हृदय में हर्ष अपार मधु पवन क्रीडित है बारंबार यूँ लगे कल्पना होगी साकार कौन हो तुम मेरे राजकुमार पुष्ट तन लगते सुकुमार दृष्टि जब उठे तुम्हारी ओर मन पुलकित हर्ष का ओर न छोर  भगिनी वैदेही का स्वयंवर आज है हर्ष कोलाहल संपूर्ण राज विदेह पिता का प्रण है अविचल प्रत्यंचा चढेगी कब , किस पल यों सोच रही मन में अपने खुले नेत्र चहुँ ओर सपने मंद हास्य हैं कुंचित अलकें बिछ्तीं जाती हैं प्रसून पलकें  वैदेही सुशोभित वरमाल लिए है मन प्रसन्न संकुचित हृदय निर्निमेष नेत्र मैं देख रही अहा ये सुख वैभवपूर्ण घड़ी मुखरित जनमानस तुमुल नाद सजल चितवन सस्मित हास अभिराम राजकुँवर श्रृंखला मार्गशीर्...

कुछ कविताएँ

 शांत स्पंदन जल लहरी मैं आ बैठी सागर- तीरे  नियति शासन से विवश संध्या अवतरित हुई धीरे-धीरे अश्रु संग तम घोल लिखती  पिय वियोग का वह इतिहास कहीं दूर एक नन्ही पाखी सहसा कर बैठी मृदु हास  क्यूँ तू इतनी है खिलखिलाती किसे है स्मृति पथ में लाती ? अरी पगली , सुन हो गंभीर पिय बिदेस हृदय विकल अधीर श्रृंगार , हार छूटा है समस्त  अस्थिर चित्त ,सुमिरन में व्यस्त  अलकें उलझीं , दुर्भर पीड़ा  वो मोहिनी छवि केलि- क्रीड़ा  नहीं अपराध मेरा है जग - माया यत्र-सर्वत्र तम की छाया  क्रूर भाग्य की ये निर्ममता हिय क्रंदित विष विषमता #अर्चना अग्रवाल                            2 कैसे लिखूँ उन बातों को जो कह दी थीं बस इक क्षण में  जब थम गई थी पृथ्वी रूक गया था सब कुछ  बस इक उस क्षण में  मैंने जी लिए थे असंख्य जन्म भोला पाखी सा मन चाँद को मुठ्ठी में भर लेना चाहता था  तब मैंने स्वयं को उगते देखा था तुम्हारी बाँहों में  #अर्चना अग्रवाल            ...

मिलन बेला

आदित्य अवसान हुआ नभ में मैं पुलक , रोमांचित हुई हिय में अति उत्सुक शशि स्वागत के लिए संध्या मादक हुई अपरिमेय  तिमिर आच्छादित प्रांगण में पिय की छवि है कंगन में दीप प्रज्जवलित शोभायमान मिलन बेला निकट जान #दुआ

खबर

दुआओं में यकीं रखते हैं , लफ़्ज़ों में असर रखते हैं  दोस्त हो या दुश्मन हम सबकी खबर रखते हैं 

कुछ दिल की

कौन कहता है चेहरे से इश्क होता है हमने ऐ बेखबर साये से मोहब्बत की है  विदा देते हैं भीगी नज़रों के कंवल याद की झील में उगती है हर इक शाम गुज़रे पल छिन की यादों के उजाले छलके कौन देता है ज़हन में दस्तक हल्के -हल्के खामोशी जो बोलती है कहने दो रूह से टपके कतरा - शबनम बहने दो  तसव्वुर में हँसता है अक्स सनम का नूर की बूँद को मुकम्मल होने दो  #दुआ

पता ना था

घाव अच्छे हैं अब लगते, दर्द होता है थोड़ा सा ये दुआएँ तुम्हारी हैं , मुझे पहले पता ना था तुम दिल के पास हो इतने ,धड़कते हो सीने में मैं ख़ुद को भूल जाती हूँ , मुझे पहले पता ना था ज़िस्म की बंदिशें भूली , भटकती हूँ रूह बनकर ये अहसास की खुशबू , मुझे पहले पता ना था चाँद नमकीन होता है , चखा था कल रात मैंने ज़बाँ का ये ज़ायका , मुझे पहले पता ना था आँखों - आँखों में कह देते हो हज़ारों बातें गुफ़्तगू का ये सिलसिला , मुझे पहले पता ना था #अर्चना अग्रवाल 

तुम साथ होते तो क्या होता

जी तो रहे तुम बिन  तुम साथ होते तो क्या होता  गुलमोहर दहकता और तरह आँख में पानी ना होता  धानी चुनर उड़कर  लिपट जाती तुमसे  बारिश में मेरा मन  प्यासा ना होता  किताबों के सफ़े  फड़फड़ा कर रह जाते हैं  किस्सों में भरा गम ना होता तुम साथ होते तो क्या होता  गुलमोहर दहकता और तरह  आँख में पानी ना होता

propose day

लफ़्ज़ो की ज़रूरत ही नहीं है  तुम मुस्कुरा देना मैं पलकें झुका लूँगी 😊 #दुआ  #ProposeDay

अर्चना

काँच सा कच्चा मन हरा हो गया  फागुनी फिर सफर हो गया  ढोलकें , शंख , होरी , ऋचाएँ  मन गीतों का घर हो गया  हृदय स्पंदित , अप्रतिम प्रेम कल्पना में मिलन हो गया  पूज्य हो तुम ,आराध्य हो तुम 'अर्चना ' हर प्रहर हो गया ..  #दुआ

कुछ अनकही

कुछ कहना है जो शायद आज तक नहीं कहा या कहने की हिम्मत नहीं कर पाई। एक उम्र बीत जाती है मन की बात कह पाने में , कभी दुनिया का डर , कभी अपने आप से ही डर लगता है । शब्दों को तराशना, अंकित कर देना कभी भी आसान नहीं होता । एक सफर तय करना पड़ता है लंबा , अंधेरा और भयावह । तुम्हें शायद कभी पता नहीं चलेगा कि कितना चाहा तुम्हें , कितना पूजा तुम्हें और कितना याद किया तुम्हें ... काश... तुम समझ पाते । अगर मेरे दिल की कॉसिमक रेज़ तुम्हें छू पाती तो तुम जान पाते मेरे भावों को , हृदय के निष्पाप प्रेम को जो सिर्फ तुमसे शुरु होकर तुम पर खत्म हुआ । एक बार देखो मुझे , ज़िस्म की आँखों से नहीं , रूह की आँखों से । पढ़ो मुझे सरसरी नज़र से नहीं , दिल की गहराइयों से । छुओ मुझे हाथों से नहीं , भावों के रेशमी स्पर्श से । तो जान पाओगे मुझे , अर्चना को ,असली अर्चना को जिसे तुमने जाना ही नहीं तुम्हारे पास रहकर भी दूर रही और तुम दूर रहकर भी मेरे बहुत करीब रहे , सच कह रही हूँ मैं एकदम सच । काश... काश तुम समझ पाते

ज़िंदगी यूँ तुम्हें जिया जाए

ज़िंदगी काटी नहीं जाती जी जाती है धूप के टुकड़ों में छाँव के कोनों में विस्मृत स्मृतियों में भविष्य की आशा में आगत की आहट में कल्पना की सुगबुगाहट में ज़िंदगी काटी नहीं जी जाती है ज़िंदगी काटी नहीं जाती जी जाती है चाँद के प्यार में चाँदनी के खुमार में सितारों के साथ में प्रिय की आस में एक अबूझ प्यास में  किस्सों में कहानियों में पात्रों के सृजन में कटुता के विसर्जन में ज़िंदगी काटी नहीं जी जाती है ज़िंदगी काटी नहीं जाती जी जाती है किसी के आँसू पीने में कुछ अच्छा करने में निःस्वार्थ भला करने में तपते हृदय को शीतलता देने में कुछ मधुर लिखने में कुछ अच्छा पढ़ने में ज़िंदगी काटी नहीं जी जाती है #दुआ

इकरार

वो जो तुम कहती हो शरमा के नहीं - नहीं  बुद्धू वही तो प्यार का इकरार है कानों पे झूलती लट को घुमा  मुस्कुराती हो वही तो इज़हार है  मैं कत्थई आँखों में झाँकता हूँ जब भी सामने पाता वफ़ा का इसरार है  देखो , मानो या ना मानो पर सच है यह  इस आँख मिचौली पर दिल निसार है 

आज लबों पे फिर से एक कहानी है रूठी थी जो अब तक वो ज़िंदगानी हैबात ज़िस्म की नहीं ये किस्सा रूहानी है खामोशी में रवाँ नगमों की रवानी है

कभी-कभी

कभी-कभी ख़ुद से बातें करने को जी करता है कभी-कभी ख़्वाबों में रहने को जी करता है ज़िंदगी हर लम्हा रंग बदलती है इन रंगों में रंग जाने को जी करता है दूर है मंज़िल , सफ़र भी है मुश्किल पर एक पल में ही पहुँच जाने को जी करता है महफ़िल में फैली हो जब खामोशी हर तरफ फ़िर तन्हाइयों में रहने को जी करता है ख़ुशियों की दुकानों में मिलती हैं नकली ख़ुशियाँ अब तो मुफ़्त के गम ही पाने को जी करता है कभी-कभी ख़ुद से बातें करने को जी करता है #दुआ

चाहती हूँ

चाहती हूँ तुम में छुपे रहना थोड़ा सा एक चाय के कप में रात के चाँद में मंदिर की जोत में कसैले करेले में आईने की बिंदी में गुनगुनी धूप में तुम जब इन्हें देखो , स्पर्श करो मुझे याद करना चाहती हूँ तुम में .... #दुआ

पापा

 थोड़े नारियल से थे पापा बाहर से कठोर अंदर से मलाई थे पापा बचपन में परी मुझे बुलाते थे दाँत मेरे गिन सोलह बताते थे  जब बंगलौर से दिल्ली ना जा पाई थी चिठ्टी लिख डाक से भिजवाते थे अंतिम समय मिल ना पाई तो क्या  बाद मौत के मिलने आए थे पापा 

ज़रूरी तो नहीं

जिसे तुम चाहो वो भी तुम्हें चाहे ज़रूरी तो नहीं  चाँद तुम्हारा ही रहे हमेशा  ज़रूरी तो नहीं  रूह भटके , मुकाम मिल जाए  ज़रूरी तो नहीं  तिश्नगी लब पे हो , दरिया पास हो ज़रूरी तो नहीं  एक उम्मीद है अब भी बुझे से मन में तुम रूबरू आ जाओ  ज़रूरी तो नहीं  #दुआ

दर्द होता है

घाव अच्छे हैं अब लगते, दर्द होता है थोड़ा सा ये दुआएँ तुम्हारी हैं , मुझे पहले पता ना था तुम दिल के पास हो इतने ,धड़कते हो सीने में मैं ख़ुद को भूल जाती हूँ , मुझे पहले पता न था ज़िस्म की बंदिशें भूली , भटकती हूँ रूह बनकर ये अहसास की खुशबू , मुझे पहले पता ना था चाँद नमकीन होता है , चखा था कल रात मैंने ज़बाँ का ये ज़ायका , मुझे पहले पता ना था आँखों - आँखों में कह देते हो हज़ारों बातें गुफ़्तगू का ये सिलसिला , मुझे पहले पता ना था #दुआ 

तुम कहते तो ...

तुम कहते तो  हार जाती ख़ुद को  मगर ज़रूरी यह  तुम कहते तो ... जुबाँ ना सही  आँखों से बयाँ करती मगर ज़रूरी यह  तुम कहते तो ... हाल बेहाल तो तुम्हारा भी है संवार देती सब कुछ मगर ज़रूरी यह तुम कहते तो ... बहक उठते कदम  महक उठता हरसिंगार आँगन में मगर ज़रूरी यह तुम कहते तो ... ताल में , तलैया में  नदी की कलकल धारा में बह जाते संग - संग मगर ज़रूरी यह तुम कहते तो ... मदिर - मदिर नशा  तारी कर देता हमें हर रोज़ मगर ज़रूरी यह  तुम कहते तो ... #दुआ

किंचित

राजहंस के श्वेत पंखों से कुछ सृजन कर जाऊँगी कभी कण्व , कभी व्यास सा किंचित कुछ लिख पाऊँगी #अर्चना अग्रवाल