कुछ अधपके सपने
कुछ महके शब्द
होगी अपनी अंतहीन यात्रा
हम जाकर भी कहीं ना जाएँगे
इन शब्दों में स्मृति बन रह जाएँगें
बहते रहेगें अनादिकाल हवा में
गंध बनकर , छाँव बनकर , धूप बनकर
देह में होकर देह से भिन्न सोचना कठिन है असंभव नहीं बात करना बहती नदी से ,वृक्ष से सुखद है असंभव नहीं स्वयं में रहकर तुम्हें पा लेना प्रेम है वासना नहीं दहकते पलाश पर कविता ...
चेहरों पर चेहरे सजाए हुए हैं सब ही मुखौटे लगाए हुए हैं होठों पे बैठे खामोशी के पहरे दिल में दर्द के सागर गहरे कर जाती त्रुटि मैं पढ़ने में उनको हो जाती कुंठित मेरी चेतना समय...
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