कुछ अधपके सपने
कुछ महके शब्द
होगी अपनी अंतहीन यात्रा
हम जाकर भी कहीं ना जाएँगे
इन शब्दों में स्मृति बन रह जाएँगें
बहते रहेगें अनादिकाल हवा में
गंध बनकर , छाँव बनकर , धूप बनकर
चाँद की ज़मीं पर खेती करनी है बोने हैं कुछ सपने , कुछ भाव सलोने अश्रु जल से सिंचाई कर रोज़ निगहबानी करनी है चाँद की ज़मीं पर खेती करनी है ... जो मिल ना सका इस धरती पर उसकी फसल उगान...
बस चुपचाप बैठो मेरे पास सुनो मेरी खामोशी महसूस करो वो अनकहा जो उमड़ घुमड़ रहा अन्तस में युग-युगांतर से पिछले कई जन्मों से इस जन्म तक अब तो सुन लो ........ जब भ्रमण करेंगी हमारी आत्...
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