कुछ अधपके सपने
कुछ महके शब्द
होगी अपनी अंतहीन यात्रा
हम जाकर भी कहीं ना जाएँगे
इन शब्दों में स्मृति बन रह जाएँगें
बहते रहेगें अनादिकाल हवा में
गंध बनकर , छाँव बनकर , धूप बनकर
सागर सम इस सृष्टि में होता लहरों का नर्त्तन हैं मदिर , अत्यंत सुरभिमय ह्वदयंगम भाव आवर्त्तन मुखरित हैं गीत संगीत यहाँ ,नुपूर कंकण बज रहे प्रखर पावस में अगणित ज्योर्तिकण च...
चेहरों पर चेहरे सजाए हुए हैं सब ही मुखौटे लगाए हुए हैं होठों पे बैठे खामोशी के पहरे दिल में दर्द के सागर गहरे कर जाती त्रुटि मैं पढ़ने में उनको हो जाती कुंठित मेरी चेतना समय...
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