लिख पाऊँगी
मेरी लेखनी
मेरा काव्य सृजन
काव्य के नव रूपों के पुंडरीक
भाव नदी से निकसते
असंख्य भास्कर , अगणित शशि
प्रस्फुटित होता नाद सौन्दर्य
स्नेह का आँचल सहलाता मुझे
तपोवन की पवित्रता घेर लेती मुझे
महर्षियों का आशीर्वाद है
विटप , महाद्रुम की छाँव
प्रकाट्य होते भाषा के सनातन छन्द
राजहंस के श्वेत पंखों से कुछ सृजन कर जाऊँगी
कभी कण्व , कभी व्यास सा शायद मैं लिख पाऊँगी
#दुआ
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