तुम और तुम

हृदय जलधि है अथाह
प्रस्फुटित होती मेरी चाह
मेरे हर्ष के कूल हो तुम
नयन कोर तक रहना तुम
विश्व उद्‌धि के हृदय अधीर को
अपने अहं से भले ही चीर दो
मेरी स्मरण शक्ति के सार तुम
इसमें बसे ही रहना तुम
नेत्र आरसी में बसा कर
निद्रा को त्याग - विचार कर
सदा श्वास में रहते तुम
जीवन जोत से जलते तुम
श्वास - छंद का चक्रवात है
भावों का हो रहा जल प्रपात है
आसक्ति के रंगीन धागे से तुम
मेरे आंचल की डोर से बंधे तुम 

#दुआ

Comments

Popular posts from this blog

सृष्टि रहस्य

लम्हे

चेहरा