कुछ कहना है

क्यूँ हम हमेशा दायरों में बंध कर बाते करते हैं कभी धर्म का दायरा कभी जाति का , कभी

वर्ग विशेष का तो कभी प्रांतीयता का , ये सब टैग ज़रूरी हैं क्या हमारे साथ ? क्यूँ हम अहम्

को छोड़ सिर्फ इंसान के तौर पर संवाद नहीं कर पाते , क्यूँ सो कॉल्ड सोसायटी के तमगे लगाए

फिरते हैं इस दुनिया में I ज़हनी तौर पर हम चाहे कितनी भी तरक्की क्यूँ ना कर लें , बेसिक तो

सदा से एक ही है और एक ही रहेगा इंसान से इंसान का रिश्ता , भावों का रिश्ता , अपनत्व का

रिश्ता ,लगाव का रिश्ता ।

बस यही सब खो सा गया है आजकल , एक दूसरे के सुख-दुख समझना , किसी के हृदय को छू

पाना । गैरों की क्या बात करें , गहरे रिश्तों में भी यही समस्या है , तभी तो सोशल मीडिया

लाइफ की दरकार है सब को । जो बातें मोहल्लों में कह सुनकर सुलझा ली जाती थीं उन्हें

लोग सुदूर क्षेत्र के दोस्तों को बताने लगे हैं , सलाह माँगने लगे हैं , ये कैसी रिक्तता है ? कैसी

शून्यता है ? कैसी प्रगतिशीलता है ?

विचार करिए

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