स्मृति
अतिरंजित थी स्मृति उसकी
कुछ मधुरा कुछ त्वरा सी
मन मेरा उसमें तल्लीन हुआ
प्रियदर्शन को सदा लोभी
जो उल्लास था बने ज्वाला
ग्रीवा में पिय की माला
खटकती हिय में विषमता
तिस पर नियति की निर्ममता
मैं द्वार पर पिय के भिखारी
जीवन हारा मृत्यु हारी
संपूर्ण विश्व की ये माया
माटी हुई कंचन काया
#दुआ
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