कुछ पन्ने फ़िर लिखना चाहती हूँ मैं ज़िंदगी दोबारा जीना चाहती हूँ मिटा दूँ कालखंड से चॉक के निशां डस्टर से अतीत पोंछना चाहती हूँ बनूँ फ़िर अपनी मर्जी की मालिक तकदीर फिर लि...
तुम अपने शहर में चाँद देखना मैं अपने शहर में मैं उसमें खारे पानी का दरिया देखूँगी तुम भावनाओं के ज्वार देखना वहाँ हमारा छोटा सा घर भी है जिसके दरवाज़े नीलम से बने हैं और रसो...
मेरे सिरहाने तेरी यादों के साये हैं आज फ़िर तेरी रहगुज़र में आए हैं वो दूर सुनहरी ख्वाबों की बस्ती है अकीदत से हम उसे बसा आए हैं दिल की दुनिया है बड़ी संगीन सी बस तज़ल्ली हिज...
आज दिल कुछ उदास सा है ज़ख्म भी कुछ खास सा है शिद्दत से निभ जाती थी वो रस्म हाल उसका बदहवास सा है शाम से ही धुंधली यादों का हुजूम मेरे तन्हा दिल के आस-पास सा है मैं चाहती थी वो भी ...
कुछ पन्ने फ़िर लिखना चाहती हूँ मैं ज़िंदगी दोबारा जीना चाहती हूँ मिटा दूँ कालखंड से चॉक के निशाँ डस्टर से अतीत पोंछना चाहती हूँ बनूँ फ़िर अपनी मर्जी की मालिक तकदीर फिर लि...
सच कहो अब भी तुम्हारे ज़हन में आती हूँ क्या ? यूँ चौखट पर खड़े तुम्हारा इंतज़ार करती पाते हो क्या ? वो तुम्हें ढूँढती निगाहें वो बेकली मुझमें पाते हो क्या कुछ कहने को हिलते पर ...
कसमसाती देह पर अंकन छोड़ दो कान में गुनगुना कर मकरंद घोल दो हम आप घुल जाएँ यूँ इत्र की तरह यौवन का लरजता तटबंध तोड़ दो मन से मन , तन से तन कुछ मिले इस तरह उफनती नदी का चलन मोड़ दो ...
अभी ठीक से कहाँ देख पाई तुम्हें अभी ठीक से कहां चीन्ह पाई तुम्हे तुम जो परत दर परत खुलते रहे अभी ठीक से कहां समझ पाई तुम्हें अंतर्मन की गुफा अंधेरी ...
उनसे ना मिले थे तो तलबगार ना थे और कुछ भी थे मगर बेज़ार ना थे वो जो कसक सी लगे है दिल में हालात अपने आज़ार ना थे ये तीरगी है मेरे मुकद्दर की मेरे हिस्से में ख़ार - ज़ार ना थे सब्र ...
घाव अच्छे हैं अब लगते, दर्द होता है थोड़ा सा ये दुआएँ तुम्हारी हैं , मुझे पहले पता ना था तुम दिल के पास हो इतने ,धड़कते हो सीने में मैं ख़ुद को भूल जाती हूँ , मुझे पहले पता ना था ज़...
शांत स्पंदन जल लहरी मैं आ बैठी सागर- तीरे नियति शासन से विवश संध्या अवतरित हुई धीरे-धीरे अश्रु संग तम घोल लिखती पिय वियोग का वह इतिहास कहीं दूर एक नन्ही पाखी सहसा कर बैठी मृ...
पीर बढ़ रही है चलो मुस्कुराते हैं आँख भरने लगी है चलो गाते हैं प्राण हैं विकलित कुछ लिखते हैं भीतर के घाव बाहर कहाँ दिखते हैं ? तुम कहो शहर हम जंगल कहते हैं गुलमोहर के फूल जह...
रोज़ सवेरे जो खोल लेते हो गेसू अब शाम देखूँ कि सवेरा देखूँ चाँद बेपरदा रहे तुम परदे में उसके जमाल को देखूँ कि तुमसे बात करुँ इश्क की बारिश में हम भीगते रहे तेरा इन्कार देखूँ ...
पीर बढ़ रही है चलो मुस्कुराते हैं आँख भरने लगी है चलो गाते हैं प्राण हैं विकलित कुछ लिखते हैं भीतर के घाव बाहर कहाँ दिखते हैं तुम कहो शहर हम जंगल कहते हैं गुलमोहर के फूल जहाँ दहकते हैं अपवाद ही अपवाद नियम कहाँ ठहरते हैं जिजीविषा है पर शमशान में रहते हैं इंसानों के वेश में भेड़िए रहते हैं बच्ची भी सुरक्षित नहीं , हम कहते हैं कपड़ों ,घूमने को बनाते हैं ढाल प्रशासन की चुप्पी हम सहते हैं #दुआ
कतरा - कतरा ढूँढता रहा ज़िंदगी एक लिबास की तरह पहनी ज़िंदगी कभी बेहिसाब जी थी ज़िंदगी कभी दर्द के साये में थी ज़िंदगी रूठी थी हम मनाते रहे ज़िंदगी दरवेशों सी भटकती रही ज़िंदगी रिश्तों के मकड़जाल में उलझी ज़िंदगी आँख गीली और रूह प्यासी ज़िंदगी दोज़ख भी और जन्नत भी है ज़िंदगी निगाहे - शौक की तलबगार है ज़िंदगी उम्मीदो- बीम है बड़ी ज़िंदगी फ़ज़ाए - दो-आलम से लिपटी ज़िंदगी शबनम की दो बूँदों में सिमटी ज़िंदगी कभी उफ़ तो कभी हाय है ज़िंदगी #दुआ
चुप रहें अधर संवाद पूरा हो जाए बनूँ ना याचक , याचना स्वीकार हो जाए श्रेय ना मिले तो कोई बात नहीं किसी तारे पर मेरा नाम हो जाए कोई तो याद करे मुझे मरने के बाद किसी का एक क्षण मेरे ...
वो जो नन्ही सी इक बदली है छुप-छुप कर इशारे करती हैं भिगोकर मेरा तन-मन यूँ मुझे बावरा करती है कभी चाँद की ओट से लुकाछिपी के खेल में वो सरपट दौड़ लगाती है मैं पीछे रह जाऊँ तो मुझे...
कैसे लिखूँ उन बातों को जो कह दी थीं तुमने इक क्षण में जब थम गई थी पृथ्वी रूक गया था सब कुछ बस इक उस क्षण में मैंने जी लिए थे असंख्य जन्म भोला पाखी सा मन चाँद को मुठ्ठी में भर लेन...
रात खामोश है मेरे दिल की तरह तेरी याद महके महुआ की तरह ज़िस्म की बात सभी करते हैं रूह को समझो फरिश्ते की तरह मैंने चाँद से तेरा पता पूछा था सर झुकाया उसने इक मुज़रिम की तरह सि...
बढ़ जाती घुटन हृदय में प्रस्फुटित होती काव्य रूप में मौन में भी बातें करे मन उगता है गीत हृदय में ख़ुद की पहचान भी हो जाए दूभर पहली बरसात की सौंधी महक कागज पर अंकित हो जाती ह...
बिखरे क्षण समेटना चाहती हूँ हाँ काव्य सृजन करना चाहती हूँ फिसलते वो ज्यों हो रेत के कण छितरते वो ज्यों हो ओस के कण मुक्त हो जीना चाहती हूँ हाँ काव्य सृजन करना चाहती हूँ मिटत...
चलो आज रंग-बिरंगे धागों को सहेज लिया जाए उलझने हैं बहुत क्यों न सुलझा लिया जाए कश्मकश नाजुक वक्त की है बड़ी मन को ठहरा कर गहरी साँस ली जाए कौन है यहाँ जो साथ देता है उम्र भर थो...
इन काले सफेद पन्नों के पीछे छुपे हैं कुछ भयावह सत्य जिन्हें देख , पढ़ सुन्न होती शिराएँ कराहों से भरी दर्द की स्याही से लिखी ये खबरें अलसुब्ह मेरी ड्योढ़ी पे आ जाती हैं विश...
वो जो अनकहा था शायद अब अनकहा ही रहेगा वो जो पगली सी लड़की थी शायद बुद्धु ही रहेगी मन की असंख्य तहों के नीचे कहीं छुपा है कोहरा सा जो चाहत की ब्रेललिपि में लिखा है जिसे पढ़ने क...
फास्ट फूड की लूट है लूट सके तो लूट हाय फिर कब खाएंगें , जब प्राण जाएंगें छूट बर्गर लगे है प्यारा नूडल्स पर जी ललचाए पिज्जा , पैटी बिन मोसे रहा ना जाए कहे 'दुआ' सब सुन लो जीभ होये स...
वो जो तुम रोते-२ोते हँस देती हो अच्छा लगता है बाते करते हुए दुपट्टे के कोने को दाँतों से काट देती हो अच्छा लगता है चाँद निहारते - निहारते खो जाती हो अच्छा लगता है मेरी शर्ट के ...
प्राण आकुल तन हो उठा अधीर पुनः आज मलयज समीर प्रिय स्मृति में गाए ललित गान वनिता स्मित नयन कर बैठी मान प्रेम भावना , मधुर पीड़ा धन्य मानस चित्र प्रीति अनन्य निस्तब्ध रात्रि ...
कुछ घड़ी होती उर्वर नमी पा अश्रु जल की प्रस्फुटित कर देतीं कोंपले काव्य की कुछ पल होते बंजर सदृश भावों , अनुभावों से इतर संवेदनाओं से शून्य रिक्तता से आवृत्त बस , इन दोनों क...
प्रेम के ज्यामितीय आकारों में मुझे वृत्त पसंद था क्योंकि वो केवल तुम्हारे चहुँओर था और तुम्हें त्रिकोण चूंकि वो किसी तीसरे के साथ था मैं वृत्त में तुम्हारे इर्दगिर्द घू...
रुधिर पूर्त नसें भयंकर ज्वाला शमन उपचार प्रिय ने निकाला बाधा , विलंब ना माने मन क्षण भर सुख शीतल तन आहत मान हुआ पराभूत स्मृति बनी शांति दूत जीवन जागरण , सुषुप्ति मरण माँस मज्जा का ये आवरण कुछ प्रकाश धूमिल सा दीख रहा मौन खिन्न , अवसाद भरा दूरागत ध्वनि सुनती यहाँ ऐसी निस्तब्धता और कहाँ #दुआ
आदित्य अवसान हुआ नभ में मैं पुलक , रोमांचित हुई हिय में अति उत्सुक शशि स्वागत के लिए संध्या मादक हुई अपरिमेय तिमिर आच्छादित प्रांगण में पिय की छवि है कंगन में दीप प्...
हृदय में जागी नव अभिलाषा कुछ अतिरंजित कुछ उत्प्रेरक सी विचारों की यह नव तरिणी होती अग्रसर नवयौवना सी मैं तटस्थ बैठी ध्यानमग्न देख रही ये नव विचलन जीवन का नूतन मार्ग यह अ...
रोज़ देखती हूँ एक सपना रोज़ तोड़ देती हूँ पसीने से सीज़ी हथेली पर कितने रंग संजोती हूँ आकाश पर उड़ती चील कलम मेरी छीन लेती है अधूरी कुछ कहानियाँ , कुछ कविताएँ इर्द-गिर्द मं...
मधुमय बसंत तुम जीवन धन तुम अलसाई अलकों में राग चंद्र तुम कुंतल जाल पाश में मेरे हृदय को करती कैद तुम पुलकित , उन्नत सर्वांग मेरा मधुकरी का संचित धन तुम
आज भी याद आती है वो कलम से लिखी चिठ्ठी जिस पर मिलती थीं अपनों की खबरें वो दुख की तस्वीरें वो सुख की तहरीरें पेड़ों पर लगे आम खेतों में लहलहाता धान सब दिखता था उसमें अम्मा की द...
हे कुर्सी माता कैसे करूँ मैं तेरी श्लाघा तुम ही जग को नचाती हो स्वप्न में नित भरमाती हो छ्ल, प्रपंच सब तुम्हरे कारण दूध मलाई दे जाती हो ठाठ - बाठ सब नौकर-चाकर संग अपने लाती हो न...
जी हाँ 'भूख ' हूँ मैं मेरा नाम एक घर अनेक मैं रहती हूँ पेट की अंतड़ियों में छुपी कातर नयन , फैले हाथ में कहीं मेरा घर है लाला की तिजोरी में जो जितनी भरे खाली रहे मुझे चीन्ह सकोगे ...
आज माँ से बातें करना चाहती हूँ ढेर सारी बादलों के पार , चंदा के गाँव में जो भी लाइन मिला दे उस नेटवर्क से जुड़ना चाहती हूँ पिछले इक्कीस सालों का बिछोह सारे रंजो गम , खुशियाँ जल...