क्यूँ हम हमेशा दायरों में बंध कर बाते करते हैं कभी धर्म का दायरा कभी जाति का , कभी वर्ग विशेष का तो कभी प्रांतीयता का , ये सब टैग ज़रूरी हैं क्या हमारे साथ ? क्यूँ हम अहम् को छोड़ ...
राह है दूभर विकल है तन , मन पुलकित नहीं है वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है किंतु , परंतु , आशा , निराशा सब हैं मन में आते पर भवितव्यता के बस में हम सब जीते जाते तिमिरावृत...
मेरी लेखनी मेरा काव्य सृजन काव्य के नव रूपों के पुंडरीक भाव नदी से निकसते असंख्य भास्कर , अगणित शशि प्रस्फुटित होता नाद सौन्दर्य स्नेह का आँचल सहलाता मुझे तपोवन की पवित्...
दिन है कोरा कागज़ मेरा प्रेम सुई , हृदय है डोर कहानियों की लिखकर किताब ज़िल्द चढ़ाती इस पर रोज़ आँसू से गीले पन्ने कुछ लिखा हुआ कुछ धुला हुआ कोई पाठक ऐसा ना मिला जो पढ़ता इस...
कुछ अधपके सपने कुछ महके शब्द होगी अपनी अंतहीन यात्रा हम जाकर भी कहीं ना जाएँगे इन शब्दों में स्मृति बन रह जाएँगें बहते रहेगें अनादिकाल हवा में गंध बनकर , छाँव बनकर , धूप बनक...
बड़ी है नशीली दिसम्बर की धूप कुछ है लजीली दिसम्बर की धूप तेरी छत से मेरी छत तक छनकर छितराती दिसम्बर की धूप छूना चाहूँ पर छू ना पाऊँ बाँधू तो बाँध ना पाऊँ चंदन सी महकती दिसम्...
हृदय जलधि है अथाह प्रस्फुटित होती मेरी चाह मेरे हर्ष के कूल हो तुम नयन कोर तक रहना तुम विश्व उद्धि के हृदय अधीर को अपने अहं से भले ही चीर दो मेरी स्मरण शक्ति के सार तुम इसमे...
पत्थर मारेंगें वो ये पता है हमें अपने सिर को बचाना बड़ी बात है देश का मेरे हिस्सा है वो लेकिन खैरियत से गुज़रना बड़ी बात है छुक - छुक रेल हमें लगती है भली ज़िंदा बचकर आना बड़ी ...
सागर सम इस सृष्टि में होता लहरों का नर्त्तन हैं मदिर , अत्यंत सुरभिमय ह्वदयंगम भाव आवर्त्तन मुखरित हैं गीत संगीत यहाँ ,नुपूर कंकण बज रहे प्रखर पावस में अगणित ज्योर्तिकण च...
अतिरंजित थी स्मृति उसकी कुछ मधुरा कुछ त्वरा सी मन मेरा उसमें तल्लीन हुआ प्रियदर्शन को सदा लोभी जो उल्लास था बने ज्वाला ग्रीवा में पिय की माला खटकती हिय में विषमता तिस पर ...
ज़िंदगी बहुत हुई तेरी लुका छिपी , अब आगे बढ़ । तंग आ चुकी मैं तेरे नखरो से जीने के लिए बहुत समझौते किए हैं , बस अब सुकून चाहिए , थोड़ा आराम चाहिए किसी को सफाई ना देनी पड़े , कुछ समझा...
एक बार फिर से ख्वाहिश हुई है जीने की , वज़ह भी पता नहीं , पर तलब सी लगी है जीने की । कुछ है जो रह-रह के घुमड़ता है दिल में ,आकार नहीं दे पाती , लिख नहीं पाती पर कुछ तो है जो धुंध की तरह सी...
एक आशियाना ऐसा बनाना है सूरज को कंदील, चाँद द्वार पर सजाना है प्रेम , त्याग , समर्पण के फूल खिलाने हैं बगिया में रोज़ नेह का पानी देते जाना है दीवारों पर तेरी - मेरी तस्वीर लगान...
चेहरों पर चेहरे सजाए हुए हैं सब ही मुखौटे लगाए हुए हैं होठों पे बैठे खामोशी के पहरे दिल में दर्द के सागर गहरे कर जाती त्रुटि मैं पढ़ने में उनको हो जाती कुंठित मेरी चेतना समय...
जो रफ़ाक़त की अहद हमसे किया करते हैं वक़्त बदले तो वही पल में दग़ा करते हैं उनसे नज़रों का मिलाना ,हया को खो देना कुछ गुनाह कितने हसीन हुआ करते हैं उन्हें महसूस किया तसव्वुर ...
ओस की बूँद हूँ मुझे कुछ पल जीने दो ना बाँधो बंधन में यूँ मुक्त ही रहने दो दूर से देखोगे तो मुझे हीरे की कनी सा पाओगे पास आओगे तो हाथ में लेने को मचल जाओगे ना करना स्पर्श मुझे अम...
तुम जो मुस्कुराओ तो कोई बात बने ये जो बर्फ सी जमी है पिघले तो कोई बात बने चाँद तो रोज़ नज़र आता है ज़मी से वो आगोश में आए तो कोई बात बने तेरी अदा , वफा, रंगत बड़ी सुहानी है हमको कत...
लेखन वास्तव में दुरूह कार्य है , जब किसी पात्र की हत्या करनी होती है ना तो कैसा - कैसा उमड़ता घुमड़ता मन में कि क्या बताएँ बस । कई बार रोई हूँ मैं किसी को मारकर अपनी कहानी में Iए...
मैं जवाब पूछूँ तुम सवाल बन जाना मेरे हर अहसास की किताब बन जाना माना कि दुनिया में बहुत कम हैं खुशियाँ कायनात में मेरी आखिरी तलाश बन जाना आलम - ए - मस्ती में हम रोज़ लेते हैं तेर...
गर्मी की दोपहर है सूनी सी , अलसायी सी दिवस काल में छोटे से टुकड़े की भाँति समायी सी निस्तब्ध खड़ी मैं इस मोड़ पर किंचित सकुचायी सी आँख नींद से मुंदी जाती , बीच-बीच में जग जाती ...
याद है तुम्हें ? अक्सर रात को दो बजे तुम्हारी चाय की तलब । किटकिटाती सर्दी हो या पसीने से भरी गर्मी , तुम्हें चाहिए कड़क ब्राऊन चाय । सच बड़ी कोफ़्त होती थी कभी-कभी । पर कभी-कभी ...
वक्त बनाता है सिकंदर वक्त बनाता फकीर है वक्त से बड़ी न कोई भी शमशीर है बैठा देता ये अर्श पर , ला देता है फर्श पर इसे कम न समझना नाम इसका ही तकदीर है कितने ही स्वयंभू आए , कितने ही ...
हर सूँ वही नज़र आता है जब प्यार किसी से होता है आग सी लग जाती है सीने में जब प्यार किसी से होता है कारज़ारे उलफ़्त में इक तमाशा सा होता रहता है दिल अपना और फिक्र गैर की जब प्यार ...
आज सोचूँ तो कल हो जाऊँ तुझे लिखूँ तो तुम बन जाऊँ प्यार करूँ तो राधा बन जाऊँ नाचूँ तो मीरा बन जाऊँ रोऊँ तो समन्दर बन जाऊँ हठ करूँ तो पर्वत बन जाऊँ बह चलूँ तो गंगा बन जाऊँ क्या कर...
अंबर पथ से उतर रही अलसाती सी , मदमाती सी सौंदर्य गर्विता नारी है वो ज्यों नदी कोई बल खाती सी कवि गण की प्रेयसी है वो कर देती उन्हें अनुरागी कोमल कमनीय कंठ गूँज उठते कईं राग , वि...
.राह है दूभर विकल है तन , मन पुलकित नहीं है वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है किंतु , परंतु , आशा , निराशा सब हैं मन में आते पर भवितव्यता के बस में हम सब जीते जाते तिमिरावृत...
बार में घुसते ही उस गौरांग सुदर्शन युवक ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो सारी मेजें भरी हुई थीं । मन में आया इस छोटे से शहर में इतने पीने वालें कहाँ से जुट गए तभी काँच की खिड़की क...
ग्रीष्म ऋतु सूर्य भीषण ताप है देता शशि शीतल सुंदर शुष्क तालु मृग भटकते देख मरीचिका क्षण भर पावस ऋतु चातकों की तृषा कुल याचना स्वीकार शीघ्र करते हैं जलद श्यामल वर्षा कर प्...